
एक पल भी मेरे साथ ठहरती ही नहीं है
जो साथ चलूँ साथ में चलती भी नहीं है
सोचा था हमने कभी तो इसके रूबरू होंगे
ज़िदगी है मेरी, ढंग से गुजरती ही नहीं है
खवाबो में तेरे देख ये बोझिल सी हो गई
मेरी नींद जो आँखों से निकलती ही नहीं है
यूँ रोज ही देता है सजा तो वो मुझको
कमी मेरे होंसले मे अब होती ही नहीं है
कई बार जागे हम सुबह की तलाश में
वही कयामत की रात है ढलती ही नहीं है
कभी तुझ से अलग हो कर हम खून रोये थे
उस दिन से ये आँख आंसू रोती ही नहीं है

That is a great one to start the year man. The picture suffices it well too. :)
ReplyDeleteKudos to the budding shaayar!
thnx yaar for liking it.
ReplyDeletei hope i'll come up with much better ones... :)