Thursday, February 25, 2010

मन का मीत !!!


छायी फिर से बहार हो जैसे
हल्का हल्का खुमार हो जैसे

रात भर थे तुम ही ख्यालों मे
दिल को तुमसे ही प्यार हो जैसे

बात ऐसी वो कह गया सब से
बस मेरा ऐतबार हो जैसे

हर घडी पूछता है वो सबसे
रखता मेरा ख्याल हो जैसे

कितने खामोश है लब उसके
दिल मे कोई गुबार हो जैसे

रहती है बस नमी सी आँखों मे
अब भी कोई इन्तजार हो जैसे

मर के भी नाम था तेरा लब पे
जाँ ये तुझ पे निसार हो जैसे

No comments:

Post a Comment