बारिश थी, हम थे और घनी हो रही थी शाम
तुम ने लिया था कांपते होठों से मेरा नाम....
मैंने ने कहा था " आओ यूँही भीगते चले
इन रास्तों में देर तलक घूमते रहे.....
मेरी कमर में हाथ यह फूलों सा डाल कर
कंधे पे मेरे रखे रहो यूँही अपना सर....
हांथों को में कभी, कभी बालों को चूम लो....
देखो मेरी तरफ़, तू मेरी आंखों को चूम लो.....
पानी के यह जो फूल हैं रुख पर खिले हुए...
इन में इश्क के रंग है सारे घुले हुए......
होंठों से इनको चुनते रहे खुशदिली के साथ....
तारे हमें तलाश करे चांदनी के साथ......
यूँही किसी दरख्त के नीचे खड़े रहे....
बारिश के बाद भी देर तलक लिपटे खड़े रहे....
तुमने कहा था, " आओ चले रात आ गई"
दिल जिस से डर रहा था वो बात आ गई.....
बीते समय की याद ही रास्तों में रह न जाए....
ये दिल कहीं मानसून की बारिश में बह न जाए....
कुछ देर एक चुप्पी रही दरमियाँ में.....
गिरहें सी जैसे पड़ने लगी हो जुबां में.......
तुम पीछे हटने वाले थे जाने के वास्ते.....
आँखें झुका रहे थे चुराने के वास्ते......
एक दम गिरा था फूल उस डाली से.......
देखा था तुम ने मेरी तरफ़ इंतज़ार से.............
बारिश में भीगते हुए झोंके हवा के थे......
ये चन्द लम्हे कभी मेरी ज़िन्दगी थे..........
Thursday, June 18, 2009
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