Sunday, May 17, 2009

एक गलती

बहुत समझाया ख़ुद को मगर समझा नही पाये
बहुत मनाया ख़ुद को मगर मना नही पाये
जाने वो क्या जज्बा था वो एहसास था
खूब भुलाना चाहा उसे हमने मगर भुला नही पाये


ये ज़िन्दगी ने भी अजीब खेल है खेले
कभी ग़म तो कभी हसी के है मेले
हसके तो ज़िन्दगी जी ली हमने
मगर उस गमो की दुनिया को हरा नही पाये


भूलना किसी को आसान नही ये जाना था हमने
बहुत होती है तकलीफ ये भी सुना था हमने
कोशिश की फ़िर भी भूलने की उसे
मगर वो चेहरा वो यादें दिल से निकाल नही पाये


ज़िन्दगी के भी कुछ अपने उसूल होते है
चाह कर जिन्हें तोडा नही जा सकता
उसूलों के लिए किसी का दिल तोडा है हमने
ऐसा क्यूँ किया हमने, ये हम ख़ुद को समझा नही पाये
ऐसा क्यूँ किया हमने, ये हम ख़ुद को समझा नही पाये .............

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